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नारीवादी लेखिका, उद्योग जगत की गहरी जानकार महिला, इन सबसे बढकर बोल्ड और निर्भीक आत्मस्वीकृति की साहसिक गाथा लिखनेवाली रचनाकार प्रभा खेतान की ‘अन्या से अनन्या’ यह आत्मकथा | प्रभा जी अपनी इस आत्मकथा से नारी को सन्मानित करना चाहती है| प्रभा जी का यह आत्मकथन प्रकाशित हुआ तब उनके साहस एवं बेबाकी की प्रशंसा हुई और आलोचना भी| लेकिन इन सबसे वे इतनी ऊपर उठ चुकी थी कि आलोचना और प्रशंसा का उन पर कोई असर नहीं हुआ| लेखिका की पीड़ा को इन शब्दों द्वारा समझा जा सकता है- “कैसा अनाथ बचपन था| अम्मा ने कभी गोद में लेकर चूमा नहीं| में चुपचाप घंटो उनके कमरे के दरवाजे पर खड़ी रहती, शायद अम्मा मुझे भीतर बुला ले| शायद हाँ रजाई में सुला लें| मगर नहीं एक शास्वत दूरी बनी रही हमेशा हम दोनों के बीच|” उनके संपूर्ण आत्मकथा में नारी चेतना का स्वर उभरता है| हिंदी साहित्य में ‘अन्या से अनन्या’ इस आत्मकथा का एक अलग ही स्थान है| स्त्री अधिकार एवं स्वंतंत्रता का साक्षात दस्तावेज़ प्रस्तुत आत्मकथन द्वारा स्पष्ट होता है| प्रभा खेतान की यह आत्मकथा अपानी ईमानदारी के अनेक स्तरों पर एक निजी राजनैतिक दस्तावेज़ है, बेहद बेबाक, वर्जनाहीन और उत्तेजक| ‘अन्या से अनन्या’ यह कृति समाज को दर्पण दिखाने का काम करती है, जिसमें नारी परिवर्तन का चित्रण हैं| शिक्षा प्राप्त करने पर महिला अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ विद्रोह कर सकती है, और नारी जीवन में भी चेतना लाने का काम करती है| प्रस्तुत आत्मकथा में लेखिका का पुरुषप्रधान व्यवस्था के प्रति विद्रोह का स्वर दिखाई देता है| उनके जीवन में आये हुए, अनुभवों के कारण वे एक विद्रोही नारी बनी| स्त्री अस्मिता एवं स्त्री समानता के लिए लढती रहीं, तभी तो ‘अन्या’ से ‘अनन्या’ कहलाई|

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